मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकरनगर स्थित थाना बेवाना क्षेत्र के गाँव अहलादे में हुआ था। मेरे परिवारीजनों को अशिक्षित एवं गंवई किसान होने के नाते मेरे जन्म की तारीख व वर्ष अच्छी तरह से मालूम नहीं था। जब मैं अपने गाँव से 1 कि.मी. दूरस्थ भितरीडीह गाँव में जिला परिषद द्वारा संचालित प्राइमरी पाठशाला में गया तो प्रधानाध्यापक ने मुझे देखकर मेरे दादा जी से कहा था कि- किसी भी दिन, तारीख, वर्ष में पैदा हुआ हो उसको छोड़िए मैं जो तिथि व वर्ष लिख दे रहा हूँ वह इसके लिए ज्यादा उपयोगी है। हालांकि मेरे दादा जी ने कहा था कि पण्डित जी मेरा पोता 26 जून, बृहस्पतिवार की आधी रात को पैदा हुआ है तो पण्डित जी ने कहा था कि बाबू साहब ब्राम्हण मैं हूँ साथ ही इस पाठशाला का हेडमास्टर हूँ, मैं जो भी करूँगा आप और आपके बच्चे की भलाई के लिए ही करूँगा। उन्होंने मेरा जन्मवर्ष साल दो साल घटाकर 1952 कर दिया।
मित्रों आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि गंवई परिवेश में पला-बढ़ा और ग्रामीण स्तर तक के स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। विगत 45 वर्षों से लेखन कार्य। जो कुछ भी समझ में आता है उसे लिपिबद्ध करके आप तक पहुँचाता हूँ। लिखने में कोताही नहीं करता हूँ अन्दर के भावों को अन्दर न रखकर उसका प्रकटीकरण कर देता हूँ। मानव हूँ गुणों की खान हूँ, सर्वगुण सम्पन्न हूँ। दूध का धुला नहीं हूँ और न लोगों को दूध से धुलने का प्रयास करता हूँ। आस्तिक हूँ। सर्वोच्च शक्ति को सदैव याद रखता हूँ। अपने द्वारा किए गए समस्त कार्यो का विश्लेषण करता हूँ। खामियाँ मिलने पर उसमें सुधार का प्रयास करता हूँ। आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ। बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ।
कबीर दास जी किसी स्कूल में नहीं गए थे, मैं कबीर तो नहीं हो सकता किन्तु जो कुछ भी मेरे अन्तस में विचार आते हैं उन्हें अपने तरीके से प्रकट करता हूँ। मुझे अक्षर, शब्द, वाक्य को एक लड़ी में पिरोना तो आता है परन्तु भाषा और व्याकरण पर मेरी पकड़ कुछ कमजोर है। एक लम्बे अरसे से लेखन कार्य में जुटा हूँ तो मुझ पर- करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान.......चरितार्थ हो सकता है। मैं ठीक उस पहलवान की तरह हूँ जो अपने प्रारम्भिक दिनों में लोगों द्वारा अखाड़े का लतमरूआ कहा जाता रहा है। यहाँ बता दूँ कि मेरी पत्रकारिता और लेखन के प्रारम्भिक दिनों में भी मुझे हमपेशा लोगों ने अखाड़े का लतमरूआ नहीं माना और न ही कहा। इसे मैं माँ सरस्वती की अपार कृपा ही मानता हूँ, और मैं आज भी जिस परिवेश में हूँ वहाँ लोग मुझे कथित रूप से सम्मान ही देते हैं।
यह बात दीगर हो सकती है कि आज के हाईटेक युग में हाईप्रोफाइल जीवन जीने एवं स्टाइलिश हाव-भाव रखने वालों को मैं पसन्द न आता हूँ। मैं इसका कत्तई बुरा भी नहीं मानता हूँ। उम्र के 65वें पड़ाव में जब ऐसा मुझ पर बीत रहा है तो समय बीतने के साथ-साथ इन पर भी वैसा ही बीतेगा। मैं मेरे लेखन में न काहू से दोस्ती न काहू से बैर, सब पर नजर-सबकी खबर, सामाजिक सरोकार, पर पीड़ा इन सबका ध्यान रखता हूँ। मैं स्वयं अपना आत्मलोचन करता हूँ। कभी-कभी ऐसी त्रुटि हो जाती है जो मेरे लिए आत्मघाती भी सिद्ध होती है। जैसे- सत्यम् ब्रुयात, प्रियम् ब्रुयात, मा ब्रुयात अप्रियम सत्यम् इसको जानते हुए भी मैं कड़ुवा सच लिख ही डालता हूँ जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता है।
मित्रों आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि गंवई परिवेश में पला-बढ़ा और ग्रामीण स्तर तक के स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। विगत 45 वर्षों से लेखन कार्य। जो कुछ भी समझ में आता है उसे लिपिबद्ध करके आप तक पहुँचाता हूँ। लिखने में कोताही नहीं करता हूँ अन्दर के भावों को अन्दर न रखकर उसका प्रकटीकरण कर देता हूँ। मानव हूँ गुणों की खान हूँ, सर्वगुण सम्पन्न हूँ। दूध का धुला नहीं हूँ और न लोगों को दूध से धुलने का प्रयास करता हूँ। आस्तिक हूँ। सर्वोच्च शक्ति को सदैव याद रखता हूँ। अपने द्वारा किए गए समस्त कार्यो का विश्लेषण करता हूँ। खामियाँ मिलने पर उसमें सुधार का प्रयास करता हूँ। आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ। बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ।
कबीर दास जी किसी स्कूल में नहीं गए थे, मैं कबीर तो नहीं हो सकता किन्तु जो कुछ भी मेरे अन्तस में विचार आते हैं उन्हें अपने तरीके से प्रकट करता हूँ। मुझे अक्षर, शब्द, वाक्य को एक लड़ी में पिरोना तो आता है परन्तु भाषा और व्याकरण पर मेरी पकड़ कुछ कमजोर है। एक लम्बे अरसे से लेखन कार्य में जुटा हूँ तो मुझ पर- करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान.......चरितार्थ हो सकता है। मैं ठीक उस पहलवान की तरह हूँ जो अपने प्रारम्भिक दिनों में लोगों द्वारा अखाड़े का लतमरूआ कहा जाता रहा है। यहाँ बता दूँ कि मेरी पत्रकारिता और लेखन के प्रारम्भिक दिनों में भी मुझे हमपेशा लोगों ने अखाड़े का लतमरूआ नहीं माना और न ही कहा। इसे मैं माँ सरस्वती की अपार कृपा ही मानता हूँ, और मैं आज भी जिस परिवेश में हूँ वहाँ लोग मुझे कथित रूप से सम्मान ही देते हैं।
यह बात दीगर हो सकती है कि आज के हाईटेक युग में हाईप्रोफाइल जीवन जीने एवं स्टाइलिश हाव-भाव रखने वालों को मैं पसन्द न आता हूँ। मैं इसका कत्तई बुरा भी नहीं मानता हूँ। उम्र के 65वें पड़ाव में जब ऐसा मुझ पर बीत रहा है तो समय बीतने के साथ-साथ इन पर भी वैसा ही बीतेगा। मैं मेरे लेखन में न काहू से दोस्ती न काहू से बैर, सब पर नजर-सबकी खबर, सामाजिक सरोकार, पर पीड़ा इन सबका ध्यान रखता हूँ। मैं स्वयं अपना आत्मलोचन करता हूँ। कभी-कभी ऐसी त्रुटि हो जाती है जो मेरे लिए आत्मघाती भी सिद्ध होती है। जैसे- सत्यम् ब्रुयात, प्रियम् ब्रुयात, मा ब्रुयात अप्रियम सत्यम् इसको जानते हुए भी मैं कड़ुवा सच लिख ही डालता हूँ जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ता है।
आप पाठकों से अपेक्षा करता हूँ कि यदि आप मेरे आलेखों को पढ़ने की जहमत उठाते हों तो सुस्पष्ट तरीके से अपनी-अपनी टिप्पणियाँ अवश्य दें। मैं आपका हमेशा आभारी रहूँगा।
दिल की आवाज भी सुन, मेरे फसाने पे न जा।
मेरी नज़रों की तरफ देख जमाने पे न जा।।
मेरी नज़रों की तरफ देख जमाने पे न जा।।
दिल को देखो, चेहरा न देखो, चेहरों ने लाखों को लूटा।
हाँ दिल सच्चा और चेहरा झूठा।।
हाँ दिल सच्चा और चेहरा झूठा।।







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