आश्चर्य किन्तु सत्य: हे लाला! तुम्हारे गिफ्ट ने मेरे तीनों कालों के खोले कपाट

गिफ्ट- इस फिरंगी भाषा वाले शब्द को बोलचाल में तोहफा कहते हैं। तोहफा उर्दू शब्द है हम हिन्दुस्तानी हैं यहाँ लोक भाषाओं को छोड़कर लगभग 22 भाषाएँ बोली जाती हैं। हमारी पैदाइश विशुद्ध यानि खांटी देहाती माहौल में हुई उसी का परिणाम है कि हमारे जेहन में पूर्वजों/अग्रजों द्वारा कही गई लोकोक्तियाँ, मुहावरे, कहावतें आज भी विद्यमान हैं। जब भी हम लिखने का मूड बनाते हैं तब शब्द-संकलन, शब्द-संयोजन में उनसे काफी हेल्प मिलती है। भाषाएँ भले ही आधिकारिक रूप से 22 बोली जाती हों फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी की तर्ज पर हम हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं। राष्ट्रीय झण्डा-तिरंगा और हमारी अपनी भाषा में उक्त तीनों भाषाओं का ऐसा संगम देखने को मिलता है जैसा कि गंगा-जमुना और सरस्वती का प्रयागराज में। वही प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद हुआ करता था........खैर! छोड़िए शहरों के नाम परिवर्तन की बातें बाद में..........। इस समय मुझे लाला, दादा जैसे शब्द मिले हैं जिन पर कुछ लिखने का मन हो आया है। लाला..........यानि लाओ........दादा यानि दो..........। 
गिफ्ट- त्योहार के अवसर पर मांग कर कुछ पाना भी तोहफा कहा जाने लगा है। हमने भी चार महीने लगातार प्रयास किया था परिणाम यह हुआ कि अगस्त के शुरूआती दौर से लगातार मिन्नतें करने के पश्चात आखिर वह दिन आ गया जब मुझे फोन करके कहा गया कि आओ अपना गिफ्ट ले लो। हमारा सीना 56 का हो गया। प्रतीत हुआ कि हमारे गाँव से लेकर देश की राजधानी दिल्ली में विकास का सूरज अपने चरम पर है। नोटबन्दी का कोई असर नहीं, जी.एस.टी. की कोई प्रॉब्लम नहीं। भ्रष्टाचार का नामो-निशान नहीं.....महंगाई का अता-पता नहीं। बाखुदा मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ अपने पूरे होश-ओ-हवास में कह रहा हूँ। यह आप पर डिपेंड करता है कि मुझे अपसेट माइन्डेड मान लें। छोड़िए.....आइए बताएँ हम पर क्या बीती और हम दिवाली का गिफ्ट पाने में कैसे सफल रहे.............। 
हमारे गाँव में बहुत पहले एक कहावत कही जाती थी कि एक बिरादरी होती है जो सिर्फ लेना ही जानती है देना उसके ब्लड में नहीं। उस जाति को तत्समय लाला कहा जाता था। चूँकि अब 21वीं सदी चल रही है और सभी कुछ हाईटेक हो गया है। इस तरह की परिस्थिति में यदि हमारे देहात में कहे जाने वाले लाला लोग अब कोई दूसरा उपनाम रखते हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। उपनाम को लेकर काफी भ्रान्तियाँ हैं उस पर ज्यादा कुछ नहीं कहना है। 
हाँ तो लाला जी हमारे यहाँ एक महकमे में ऊँचे ओहदे पर पोस्टेड हैं। उनका डिपार्टमेन्ट फूड सेफ्टी और ह्यूमन हेल्थ से ताल्लुक रखता है। हमने कुछ गलतियाँ कर दी थीं उन्हीं का खामियाजा भुगत रहा हूँ। लाला दिल के इतने दलिद्र होंगे यह नहीं मालूम था। हमने लगभग 7 हजार रूपए खर्च करके एक ऐड डिस्प्ले किया था जिसका भुगतान तो नहीं मिला परन्तु दिवाली के अवसर पर बनारसी लाला ने फोन कर हमें बुलाया और कहा कि आओ अपना गिफ्ट ले जाओ। इतना सुनना था कि हमारी बांछे खिल गईं और फाग व वाइल्ड स्टोन आदि को जल्दी-जल्दी अपने बॉडी पर झोंक मारा पैन्ट की जिप हड़बड़ाहट में बगैर बन्द किए ही गिफ्ट लेने निकल पड़ा। तीन किलोमीटर की दूरी गिफ्ट पाने की लालसा में कब पूरी हो गई पता ही नहीं चला। 
लाला के कार्यालय जब पहुँचा तो देखा कि वह वहाँ नहीं थे। फोन कर पूछा कि आप कहाँ मिलेंगे मैं आपकी ऑफिस के मुख्य द्वार पर हूँ तो उन्होंने कहा कि अन्दर जाओ वहाँ राजकुमार साहब बैठे हैं अपना नाम बताओ, परिचय दो, गिफ्ट लो और मुझसे बात कराओ.........समझ गए ना........हाँ साहब.....। अन्दर प्रवेश किया, वहाँ ठीक उसी तरह करके एक गिफ्ट पैक झोले में रखा और मायूस सा होकर वापस हो लिया। इसी दौरान पैन्ट की जिप बन्द किया और सोचने लगा कि लाला साहब ने हमारे साथ 7 हजार की जगह यह क्या पकड़ा दिया। रहा नहीं गया.......गिफ्ट पैक का डिब्बा खोल डाला देखा तो विशुद्ध हमारे गाँव के चौराहे पर पकौड़ी साव के यहाँ बनने वाली बर्फी की तरह ही मिठाई थी, जिसे एक बगैर नाम वाले डिब्बे में रखकर पकड़ा दी गई थी। वजन आधा से एक किलो के बीच रहा होगा। हम गुणा-गणित करने लगे तो पता लगा कि बमुश्किल उसकी कीमत 100-150 रूपए रही होगी। ऐसा तब होता जब मैं खुद उसे एक लेमैन की तरह ग्राहक बनकर हलवाई से खरीदता। यह तो फूड साहब का गिफ्ट था जिसे किसी बेचारे हलवाई ने ही मुफ्त में दिया रहा होगा। जाने भी दीजिए.....साहब तो साहब हैं........कहना बस इतना है कि हे लाला.........तुम्हारी अकल को क्यों काठ मार गया है.........? अगर तोहफा ही देना था तो भिजवा भी सकते थे एक-दो हर्फ यह भी लिख देते कि- हैप्पी दिवाली या दिवाली की मुबारकबाद, दिवाली की शुभकामनाएँ...............। 
कहते हैं कि दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया........गलत........अब तो कहना पड़ेगा कि दाता एक आप और भिखारी मैं और हमारी बिरादरी..........। कम से कम इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि कौन सीनियर भिखारी है और कौन जूनियर.......। माना कि मैं तुम्हारी नजर में ब्राण्डेड बिरादरी का भिखारी नहीं परन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि मैं मेरी बिरादरी का सबसे सीनियर मोस्ट मेम्बर अभी भी लाला और दादा आदि जैसों का तियाँ-पाँचा करने के लिए जीवित हूँ। आहत हूँ परन्तु आश्चर्यचकित नहीं। आहत इसलिए कि तुमसे यह उम्मीद नहीं थी और आश्चर्यचकित इसलिए नहीं कि वर्षों पूर्व गाँव वाले बड़के भइया कहा करते थे कि मन्नू (मेरा बचपन का नाम) नेकी कर दरिया में डाल, लाला कौम से बचके रह....यह कौम आपन भला, भला जगमाहीं दूसरे कै भला होय चाहे ठेंगे से नाहीं को अपना मूल मंत्र मानती है, और इसी लिए सबसे लेने की बात करती है देने की नहीं। आज आपका गिफ्ट पाकर मुझे हमारे बड़े भइया याद आ रहे हैं। उनका इंतेकाल हुए 30 साल से अधिक का समय हो गया है। वह हिन्दी में स्वर्गीय, उर्दू में मरहूम और अंग्रेजी में लेट हो चुके हैं।  
दिवाली आई, मन मयूर नाचने लगा। तुम्हारी फोन कॉल आई मैं मिथुन चक्रवर्ती बन गया गिफ्ट पाया तो निहाल होने की जगह बेहाल हो गया। एक बात तो है ही तुम्हारा गिफ्ट देने का अन्दाज किसी भी राजा-महाराजा से कम नहीं। तुम लाला होते हुए भी सम्राटों, नवाबों, राजा-महाराजाओं से कम नहीं......। तुम महीन हो, लाला हो........हम भी कुछ कम नहीं......तेरा पीछा न छोड़ेंगे सोणिये, भेज दे चाहे जेल में.........। क्या समझे.........? कृपा कर तुम मेरे 7 हजार अदा करने की व्यवस्था करो............यह मत कहना कि.........विभागीय लोग तुम्हें कॉआपरेट नहीं करते। मैं सीख नहीं दूँगा कि भला मानुष बनो.......लाला हो तुम तो खुद समझदार हो, अक्लमन्द हो, बुद्धिमान हो......। तीन-चार महीनों से तुम्हारे टरकाऊ रवैय्ये से मुझे काफी कष्ट हो रहा है साथ ही आश्चर्य भी....।
इस एपिसोड में फिलहाल इतना ही शेष आने वाले दिनों में............। मैं इतना संगदिल नहीं जो यह न कहूँ कि हैप्पी दिवाली.........। मैं पकौड़ी साव की दुकान पर बनाई जाने वाली मिठाई की तरह वह तुम्हारा गिफ्ट पैक खोलकर बर्फी खा रहा हूँ.......अच्छा लग रहा है, और इस मौके पर तुम ही याद आ रहे हो........। भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, वरिष्ठ नागरिक/पत्रकार, 9454908400

लड़िकै तो लड़िकै सनका हयन बुढ़वय

ई बुड्ढा लोग अब मरै कै जून फेसबुकिया बनिकै काव कहै चाहथेन। जब उमिरि रही तब एवरेस्ट पर चढ़ेन, समुन्दर में कूद परेन, सरकारी नौकरी किहेन, ओहमन लूट-पाट मचाइ कै घर-दुआर पक्का, झंइया-झार बनवायन। घोड़ा-गाड़ी खरीदेन। अब जब रिटायर होई गयेन तब ई काहें नाय सोचतेन कि चलै कै बेर भय बाय कुछ नीक काम कई डारी। हम तो कहब कि अगर एनके घरे के बगले बंसवारि होय तो एक ठू हरियर बांस सिरिजि लेंय। पेड़-पालव बचा होय तो जरै भरेका झुरान लकड़ी कटवाई के रखि लेंय। फेसबुक पर आपन थोबड़ा और कमेण्ट लिखि कै गवन्नर न बनैं। हे भइया जनम लिहे हया तो मरब्या जरूरै, अब ओकर फिकिर करा। कबहूं केहू कै मदद करे बाट्या कि नाय................. उहै मरे के बाद कामे आये, लोगे याद करिहैं। 
एक मसबरा अउर बुढ़ापा में आखीं कै खयाल करा। मोबाइल पर लिखब-पढ़ब छोड़ि द्या। गाँव गिरांव में रहथ्या तो उहां के लोगन का जागरूक करा, शिक्षा कै जोत जलावा। इहै सबसे बड़ा पुन्य कै काम हय, अउ फेसबुक पै आपन बैभव न देखावा कि आज कलकत्ता बाटी, तो बिहान दिल्ली तो परसों मदरास औ नरसों बम्बई। अरे लोगन कां तोहरे करोड़ों, अरबों से का मतलब तूं होब्या। राजा हरिश्चन्दर तो हया नाय। अरे उमिरि कै खयाल करा भइया। नई पीढ़ी किनाय न पगला। ग्लोबल डिजिटलाइजेशन में तौ लड़िका से लैके सयाने के हाथे में भिक्षापात्र स्मारट फोन देखै कां मिलत बाय।
 ऐसन तो सायद संसार के बिकसित देसन में भी नाय देखै का मिलत। लकिन धन्य हयन देस कै नेता जवन लोगन का भरमाइ कै इन्टरनेट से जोड़ि कै ओनकै जड़ि काटि दिहेन। हे बुढ़ऊ लोग तूं काहें सनका ह्या जवन फेसबुक कै इस्तेमाल करथ्या। हमैं लागथै कि तोहरे सब बुढ़ापा में मउज-मस्ती लेय खातिर ऊ काव कहथेन हाँ उहै पोरन फिलम देखथ्या। तोहरे सबकै रवइया देखि कै लागथै कि मानसिक रूप से एक दम बिकरित होई गय हया। जब तू देखत हया तव तोहर देखि कै तोहारे नाती-पोता, लड़िका, बिटिया, बेटवा सब उहै करै लगिहैं जवन तू करथया। एक बात बतावा फेसबुक पै जवन लिखि देत्थ्या अउर होहपे जवन कमेन्ट पावथ्या अपने दिल पै हाथ रखिकै कहा कि ऊ लोग जवन तोहरे पोस्ट पै कमेन्ट देथेन का सही में ऊ सब तोहार दोस्त हयन। हम्मैं सरम लागथै। 
जब हमार नाती पोतए हमैं बतावथेन कि बाबा फलाने बुढ़ऊ जमुना जी, गोमती जी, गंगा माई नदियन मां नहाथयन और सेल्फी अपलोड केहेहयन। इहै नाय आगरा कै ताजमहल, दिल्ली कै कुतुबमीनार, बम्बई कै चौपाटी, नैनीताल जइसन जगहन कै फोटो खैंचि कै फेसबुक पै लगाये हयन, अउर उनके तथाकथित चाहै वाले मित्र लोग बहुत तारीफ किहे हयन। जा आज एतनै, न सुधरब्या तो फिर लिखब। उप्पर वाला तोहरे सबकां अपने लगे भले ना बोलावै, मुला जब तक यह धरती पै बोझ बना जीयत बाट्या तब तक तौ सद्बुद्धी देय तोहरे सबके लिये इहै कामना करत बाटी। 

- भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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ज्यादा जोगी मट्ठ उजाड़

पहले बुजुर्गों के मुँह से सुना करता था कि परिजन यानि पारिवारिक सदस्य ही धन हैं। जिनका कुनबा बड़ा होता है वे ही हर तरह से सम्पन्न होते हैं। मैं इसका पूर्णतया खण्डन तो नहीं करता परन्तु जब अपने परिवार पर दृष्टिपात करता हूँ तब महसूस करता हूँ कि परिवारीजनों की अधिक संख्या दरिद्रता के अलावा और कुछ नहीं देती है।
लोग धन इसलिए कमाते हैं ताकि वे समाज में प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ सुख-सुविधा सम्पन्न हों। हमारे अपने परिजन धन तो जरूर कमा रहे हैं परन्तु सुख-सुविधा विहीन जिन्दगी जी रहे हैं। मसलन प्रचण्ड गर्मी में बिल-बिलाना, ठण्डक में कांपना और बरसात में भीगना इनके क्रिया-कलापों से इनकी नियति बन गई है। हमने ऐसों को भी देखा है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने भी भौतिक सुख-सुविधाएँ एकत्र कर रखा है।
कहते हैं ‘‘ज्यादा जोगी मट्ठ उजाड़’’ ठीक उसी तरह हमारे परिवार की दशा है। सभी अपने-अपने फन में माहिर हैं- परन्तु खा-पीकर मल त्यागने तक सीमित है उनका जीवन। कम से कम सुख-सुविधा एकत्र कर अपना और अपने आश्रितों का तो खयाल रखते। ये लोग ऐसा करेंगे हमें तो एक प्रतिशत भी उम्मीद नहीं है। 

 -भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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गौड़ साहब एक रहस्यमयी सख्शियत

आधी रात को जब गौड़ जी ने घर का दरवाजा खोलने के लिए अपनी धरमपत्नी का नाम लेकर पुकारा तब मेरा भी ध्यान उधर चला गया था। गौड़ जी एक हफ्ते बाहर थे जाहिर सी बात है जब बाल-बच्चेदार व्यक्ति बाहर रहेगा तब उसकी पत्नी और बच्चों के मन में रहता ही होगा कि जब वह लौटेगा तब उन सबकी जरूरतों को पूरा करने के लिए धन (पैसा) लेकर आएगा।
बच्चे अबोध होते हैं। गौड़ साहब के भी बच्चे तो अभी किशोर उम्र के हैं और पत्नी गृहणी। उन्हें पता ही नहीं कि गौड़ साहेब क्या करते हैं। गौड़ साहेब को मैं उनके बचपन से जानता हूँ। उन्होंने क्या काम किया है- यह तो मुझे भी नहीं मालूम। आजकल गौड़ साहब क्या कर रहे हैं यह भी नही ज्ञात है। अपने परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं इसीलिए बच्चे और उनकी पत्नी खुश रहते हैं।
गौड़ साहेब ने कोई स्थाई काम नहीं किया है। उम्र भी काफी हो चली है। उनके काम धन्धे के बारे में कौन पूँछे कि भइया आप करते क्या हो? सुना है कि वह काफी ‘बिजी’ आदमी हैं और तब ऐसा व्यक्ति अवश्य ही पैसा कमाता होगा।
कभी-कभार मेरे मिलने वाले पूँछते हैं कि गौड़ साहब क्या करते हैं- तब स्पष्ट रूप से कहना पड़ता है कि इसे शायद गौड़ साहब भी नहीं जानते। खैर गौड़ साहब घर पहुँच गए हैं। बच्चों-पत्नी के चेहरे खिले हैं। देखना है कि अब फिर कब पैसा कमाने निकलेंगे। इधर उनकी अनुपस्थिति में काफी शान्ति थी। देखना यह है कि कल से कैसा माहौल बनता है। पत्नी की जरूरत पूरी करने में कोताही बरतने पर प्रायः चिक-चिक होती है जिसे हर कोई सुन सकता है।
गौड़ साहब ऐसे व्यक्ति हैं जिन पर यदि किसी अच्छे विद्वान द्वारा लिखा जाए तो कई मोटे-मोटे ग्रन्थ तैयार हो सकते हैं। धारा प्रवाह झूठ बोलने वाले गौड़ साहेब की तो आधी जिन्दगी कट गई लेकिन उनका क्या होगा जो उनके आश्रित और पाल्य हैं। खैर! यह गौड़ सर की प्रॉब्लम है इस पर ज्यादा सोच-विचार करना मूर्खता है। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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मैं अब आराम से हूँ

वोए गुलशन नन्दा- लिखूँ मैं और नाम तुम्हारा छपे। यह अब हरगिज नहीं होगा। बहुत हो गया यार तुमने मेरा शोषण किया। 40 साल से ऊपर हो गया मैंने तुम्हारे लिए लिखा मुझे क्या मिला या तुमने उसके एवज में क्या दिया है मुझे......? इस सवाल का जवाब है तुम्हारे पास- शायद नहीं?
मुझमें और तुममें अन्तर बस इतना था कि तुम प्रिण्ट के सम्पादक थे और मैं पत्रकार। तुमने एक आई कार्ड पकड़ा दिया था जिसे पाकर मुझे लगा था कि बहुत कुछ मिल गया है। तुमने खूब मनमानी किया और सम्पादक की हैसियत से मुझे हुक्म देते रहे। दिल पर हाथ रखकर सोचो कभी तुमने मेरे बारे में भी सोचा।
बिल्कुल नहीं- तुम तो एक तानाशाह की तरह अपनी तानाशाही से मुझ जैसे पत्रकार से अपना काम करवाते रहे। तुम्हारे इस शोषण से मैं एलास्टिक से प्लास्टिक बन गया और टूट गया- मैंने तुम्हारे जैसे सम्पादक का साथ छोड़ ही दिया क्योंकि मुझे पत्रकार परिचय पत्र नहीं पैसों की दरकार थी।
तुम्हारा साथ छोड़ने के बाद मैने स्वतंत्र लेखन शुरू कर दिया और एक दशक से वेब मीडिया से जुड़कर लेखन कार्य करके आत्मतुष्टि पा रहा हूँ। मुझे अब काफी सुकून है क्योंकि तुम्हारे जैसे घटिया सोच वाले हृदयहीन कथित सम्पादक से मेरा पिण्ड छूट गया। बताना चाहूँगा कि अब मैं काफी मजे में हूँ यह बात और हो सकती है कि पैसे के मामले में तुम आगे हो लेकिन चैन नहीं होगा जबकि मैं चैन से सोता हूँ। 

- भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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मेरे यहाँ का बिजली मीटर या बुलेट ट्रेन.....?

इतनी तो अपनी औकात है ही कि एक सेकेण्ड हैण्ड कूलर लगवा कर प्रचण्ड गर्मी में ठण्डी हवा लूँ, लेकिन यह सोच ही सकता हूँ करने की हिम्मत नहीं। आप मित्रों से कुछ ऐसी बातें शेयर करना चाहता हूँ जिसे जानकर आप मेरी मजबूरी बेहतर समझ जाएँगे। मैंने ए.सी. वालों के कक्षों में घुसना छोड़ रखा है कारण यह कि उसमें से निकलने के बाद फिर मुझे अपनी स्टडी में गर्म लू के थपेड़े खाने पड़ेंगे। तब मेरा स्वास्थ्य खराब हो जाएगा। 
डेढ़ वर्ष पूर्व की बात है- मेरे यहाँ के बिजली महकमें ने ‘इलेक्ट्रॉनिक मीटर’ लगवा दिया है। इस मीटर की स्पीड बुलेट ट्रेन की स्पीड से कई गुना अधिक है। गलती मेरी है जो विद्युत कर्मी उक्त मीटर लगा रहा था उसने एक हजार रूपए की डिमाण्ड किया था, मैं तत्समय अर्थाभाव के कारण उसे सौजन्य शुल्क नहीं दे पाया। परिणाम यह हुआ कि जितनी बिजली खपत एक दर्जन घरों में होती है उतना अकेले मेरे यहाँ होने लगी।
पता नहीं क्यों उक्त विद्युत कर्मी ने मेरे यहाँ लगाए गए मीटर में क्या तकनीक फिट कर दिया कि अब खामियाजा भुगत रहा हूँ। एकाध फैन और एल.इ.डी./सी.एफ.एल. का उपयोग होता है और बिल आता है पहाड़ सरीखा। एक गलती और कर दिया था वह यह कि मीटर लगाने वाले विद्युत कर्मी की डिमाण्ड के बारे में उच्चाधिकारी को बता दिया था, शायद यही कारण रहा कि मेरा मीटर शहर के अन्य घरों में लगे मीटर से कई गुना तेज भागता है। पाँच सौ, हजार रूपए विद्युत बिल के स्थान पर ढाई से तीन हजार रूपए प्रतिमाह बिजली का बिल मिलता है। है कोई मेरा हमदर्द जो मेरे यहाँ लगे विद्युत मीटर की जाँच कराकर उसे बदलवा दे.......?

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, 

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मैंने माननीय बनने का विचार क्यों छोड़ा, कारण आप भी जानें......

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ मित्रों! मैंने सोचा कि आप सबसे राय ले लूँ, इसलिए यह बात लिखकर आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। फ्रेन्ड्स बात यह है कि अभी लेटे-लेटे मन में विचार आया कि जनप्रतिनिधि बनकर समाजसेवा करूँ......? शायद आप में से अधिकाँश मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते होंगे इसलिए पहले आप अच्छी तरह जान लें कि मैं कौन हूँ।
वर्षों से कलमघिसने का काम कर रहा हूँ स्वयं से लेकर अपनों तक किसी को बख्शा नहीं- बड़ी वाह-वाही लूटा लेकिन अब वाहवाही से काम नहीं चलता दिख रहा है तो सोचा समाज सेवा करके धन कमाऊँ। मुझे मालूम है कि आप लोग मेरी स्पष्टवादिता को नजरन्दाज नहीं करेंगे- करना भी नहीं चाहिए। समाजसेवा ही एक ऐसा माध्यमा है जिसको अपनाने से कंगाली दूर होगी? अभी तक इलेक्शन लड़कर चुनाव में जीत दर्ज कर जनप्रतिनिधि कहलाने का विचार कभी भी नहीं आया था, परन्तु अब यह आने लगा है।
लोगों से सुना है और महसूस भी किया है कि जिसके पास धनबल नही है वह इलेक्शन जीतने को कौन कहे लड़ने का ख्वाब देखना छोड़ दे। मैंने किसी को एक कप चाय तक नहीं पिलाया है तब वोट पाने के लिए वोटर्स को ‘पुलाव’ कहाँ और कैसे लिखा पाऊँगा। यही नहीं एक पत्रकार के रूप में मैंने किसी को नहीं बख्शा है तब कैसे उम्मीद करूँ कि लोग बहैसियत एक वोटर मुझे अपना कीमती वोट देंगे-? इलेक्शन लड़कर चुनाव जीतने का मानक भी मेरे से काफी दूर है। कृष्णा सदन तक की यात्रा नहीं किया है। कलम के बजाए कट्टा तक थामने का साहस नहीं रहा और न कभी पुलिस की गाड़ी में ठूस कर थाना कोतवाली ही ले जाया गया हूँ।
जानकारों के मुँह से सुन चुका हूँ कि जो व्यक्ति इस तरह के मानकों को पूरा नहीं करता है वह जनता द्वारा ‘डिस्कार्ड’ कर दिया जाता है यानि इलेक्शन/चुनाव लड़ने के योग्य ही नहीं है। सुलेमान मिला था- मैंने अपनी जिज्ञासा शेयर किया तो उसने तपाक से कहा मियाँ कलमघसीट तुम सचमुच सठिया गए हो, जब इलेक्शन लड़कर जनप्रतिनिधि बनना था तब कलम क्यों पकड़ी- शुरूआती दौर में रमपुरिया, हाकी डण्डे फिर देशी तमंचा कालान्तर में आधुनिक हथियार रखकर जरायम पेशा अख्तियार कर लिया होता ऐसा करने से तुम्हारे पास वह सब कुछ रहता जो माननीय बनने के लिए आवश्यक होता है। मसलन समाज में दबदबा, धनबल और सत्ता के गलियारों तक अपने कृत्य से तुम्हारी पहुँच रहती।
मैंने सुलेमान से कहा यार मेरे लिए तुम कुर्बानी दो- वह पूँछा कैसी कुर्बानी। कहना पड़ा यार कहीं से ऐसे अस्त्र-शस्त्र मुहैय्या करा दो, जिसके रखने से मुझे पुलिस अन्दर हवालात करके लात-घूंसों, डण्डों से मेरी दैहिक समीक्षा करे और आपराधिक मुकदमा कायम कर नौ लाख की हवेली में जाने का मार्ग प्रशस्त करवा दे। सुलेमान हंसने लगा बोला- वाह मियाँ, क्या गजब की सोचा है ऐसा करके तुमसे पहले मैं चुनाव जीत कर माननीय बनने के लायक बना दिया जाऊँगा।
समझे मियाँ, न समझ पाए हो तो बता दूँ कि अवैध तमंचा एवं प्राणघातक अस्त्र-शस्त्र रखने के अलावा तुम्हें मुहैय्या कराने का मुझे पुलिस क्या ईनाम देगी-? अरे भइया कलमघसीट इस उम्र में जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी। हम दोनों को पहले तो पुलिस घसीटकर हवालात में लात-घूसों और डण्डों से भरहींक दैहिक समीक्षा करेगी तत्पश्चात् कृष्ण जन्मालय यानि जेल भेज देगी। कलमघसीट तुम माननीय बनने का विचार अपनी जेहन से निकाल दो। सुलेमान की बात सुनने के बाद मेरे होश उड़ गए। हलक तर करने के लिए मटके से पानी निकालकर एक ही साँस में पी गया। फिर सोचने लगा-
ठीक ही तो कह रहा है मेरा लंगोटिया यार। अब जब हम लोग 60प्लस और 70 के करीब पहुँच रहे हैं तब मैं तो मरूँगा ही साथ ही मेरा यार भी अपनी बीबी को बेवा बना देगा। यही सब सोच रहा था- तभी सुलेमान ने कहा क्यों माय डियर कलमघसीट मेरी सलाह कैसी लगी.........? कहना पड़ा यार जो कुछ होना था वह हो गया। अब माननीय बनने का विचार त्याग रहा हूँ। अब एक तरह से यह समझूँगा कि धन-बल भले ही न हो कलमबल तो है ही- बची खुची लाइफ में कलम चलाता रहूँगा। मित्रों आप लोगों को अलानाहक मैंने कष्ट दिया, जिसका मुझे बेहद दुःख है। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, 9454908400

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मेरे अपनों को काठमारी बुद्धि से कब मिलेगी निजात, बनेंगे सरोकारी...?

गर्मी की तपिश से परेशान परिवार का 8 वर्षीय शक्ति मेरे पास आया और बोला पापा जब आप के कमरे में कूलर चलता था तब खूब ठण्डी हवा मिलती थी, अब जब वह नहीं चल रहा है तब गर्मी से परेशान होना पड़ता है। उस बालक की बातें सुनकर कलेजा मुँह को आ गया। मैं अन्दर ही अन्दर रोने लगा था फिर अपने परिवार और पारिवारिक सदस्यों के बारे में सोचने लगा। शक्ति मेरे अनुज का छोटा पुत्र है। नटखट है फिर भी तेज दिमाग रखता है। मैंने उसे पुचकार कर कहा बेटा जावो फुल सर्ट पहन लो वर्ना ‘लू’ लग जाएगी, साथ ही उसे समझाया कि ठण्डक, गर्मी, बरसात के मौसम को झेलने की आदत डालो। वह मेरे लेखन कक्ष से अन्दर घर के भीतर चला गया था।
बिजली का बिल भी आता है- यह किसी को नहीं मालूम। काम काजी लोगों से कैसे कहूँ कि समय पर बिजली के बिल का भुगतान कर दें। पुरूष सदस्य पैसा कमाते हैं और सुख-सुविधा के साधनों का उपयोग/प्रयोग नहीं करते। 65 वर्षीय जीवन में मैंने इतना धन नहीं कमाया तब संचय कैसे करता। अनुज 48 वर्ष के जीवन में क्या कर रहे हैं, यह शायद उन्हें ही नहीं मालूम तब किसी दूसरे को कैसे पता चलेगा? पोतियों के पिता श्री कमाते हैं- घर का संचालन करते हैं उनके ऊपर कितना ‘भार’ है इसे सोचकर मैं चुप्पी मारे हुए हूँ। उनसे कैसे कहूँ कि पैसे का उपयोग सुख-सुविधा के लिए भी किया करो।
सभी ठकुरसुहाती पसन्द है। वाहवाही लूटने के लिए अपने घर-परिवार की चिन्ता छोड़कर औकात से अधिक धन का अपव्यय करते हैं, परन्तु कभी यह नहीं सोचते कि घर-परिवार का सुचारू संचालन कैसे हो। भतीजे के पापा, पोतियों के पिताश्री और उनकी दादी कमाऊ कहलाते हैं। गृहणियाँ उन्हीं द्वारा दिए गए आदेश निर्देशों का पालन करती हैं। बच्चे उनकी कमाई पर पढ़-लिख रहे हैं। मैं भी एक तरह से आश्रित बना घर की रखवाली कर रहा हूँ। इन कमाऊ परिवारी सदस्यों के बारे में ज्यादा क्या कहूँ- बस यह समझिए कि ये लोग यह विस्मृत कर चुके हैं कि जिस समाज में वह लोग अपनी वाली कर रहे हैं उसका आधार मैंने बनाया है।
अनुज और उनकी धर्मपत्नी की अलग खिचड़ी पकती है। वे अपने मुताबिक ऐसे कार्य करते हैं जिसे कम से कम ज्ञानी लोग तो नहीं कर सकते हैं। दिखावा पसन्द हैं ये दोनों। बच्चे अबोध हैं ऊपर वाला न करे कि उनमें भी अपने मातृ-पितृ के गुण आ जाएँ, यदि कहीं ऐसा हो गया तो वह लोग भी मेरे अनुज की तरह ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ बनकर दूसरों की जी हुजूरी और रिमोट चालित मानव होकर रह जाएँगे। अनुज की खासियत यह है कि- करना कुछ न पड़े और जरूरतें सभी पूरी हुआ करें। बातें लम्बी-चौड़ी, घर-परिवार के प्रति कोई सरोकार ही नहीं।
पोतियों के पिता श्री- जी हाँ- निरंकुश/स्वेच्छाचारी ठकुरसुहाती शस्त्र से घायल। कर्मकाण्डियों के पाखण्ड में पड़कर स्वयं की प्रतिभा का सर्वनाश करने वाले। बैसाखीके सहारे कब तक जिया जाता है, कुछ तो प्रयास करो, आदत डालो, स्वयं चलने का प्रयास करो- सफलता जरूर मिलेगी- लेकिन मैं कौन होता हूँ उन्हें नसीहत देने वाला........? पोतियों की दादी- उम्र 60$ है। इस उम्र में जितना हो पा रहा है उससे अधिक कर रही हैं। दूरगामी परिणाम के बारे में सोच रखें यह उनके वश की बात नहीं। एकलौते पुत्र की माँ होने के कारण पुत्र के कार्यों की सभी जिम्मेदारियाँ भी अपने ऊपर ले रखी है। मुझे देखकर मन ही मन गालियाँ देती होगी- हिन्दू रीति-रिवाज से शादी के बन्धन में बंधी वृद्धावस्था को प्राप्त एक महिला है, वर्ना वह ईश्वर से मन्नत मांग लेती कि मुझे जल्द ही ऊपर उठा ले। खैर-
पैसा यानि धन-दौलत, सभी कमाते हैं और भौतिक सुख-सुविधा का ख्याल रखते हैं। परन्तु मेरे परिवार में मेरी सोच का सब कुछ उल्टा ही हो रहा है। मसलन- गर्मी पड़ रही है भौतिक शरीर को राहत प्रदान करने के लिए कूलर तो लगवा ही सकते हो। जब हीटर, वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राइण्डर, फ्रिज रखे हो तो कम से कम बच्चों के आराम के लिए कूलर, आर.ओ. सिस्टम वाटर प्यूरीफायर, शौचालय तो बनवा ही लो। यही नहीं कम से कम जब सब खर्च तुम्हारे ऊपर है तब राजस्व बिलों को क्यों भूल जाते हो-? उन्हें अदा करके एक शिक्षित नागरिक होने का परिचय तो दो। हाँ-हाँ जानता हूँ कि मिक्सर ग्राइण्डर, वाशिंग मशीन, फ्रिज, टी.वी. तुमने अपने पैसे से नहीं खरीदा है परन्तु उनका इस्तेमाल तो हो रहा है जिसमें बिजली खर्च होती है और हर माह ढाई हजार बिजली का बिल होता है। कौन भुगतान करेगा- इन सबकी भी जानकारी रखा करोगे- आने वाले दिनों में तुम्हारे लिए ही लाभकारी रहेगा।
शक्ति बच्चे की बातें न सुनी होती तो इतना लम्बा चौड़ा आलेख शब्द-प्रहार के रूप में लिखने की क्या आवश्यकता थी-? बहरहाल- हे ‘शब्द-प्रहार’ स्तम्भ को पढ़ने वाले मित्रों (स्त्री/पुरूषों) मैंने जो भी लिखा है क्या वह गलत है अथवा किसी हद तक सही-? आप अपनी बेबाक राय दें। आप से गुजारिश है कि आप ईश्वर से दुआँ करें कि बच्चे शक्ति (8) के पिता-माता और उससे सम्बन्धित अन्य कमाऊ परिजनों को सद्बुद्धि आए और वह लोग कुछ ऐसा करें जिसे करने के बाद लगे कि सचमुच इन लोगों का सरोकार एक संयुक्त परिवार और उसके हर सदस्यों की आवश्यक आवश्यकता से है। इनके सरोकारी बनना/होना स्वयं इनके लिए, परिवार और समाज के लिए आवश्यक है। ऐसा होने से मैं तनाव से मुक्ति पा जाऊँगा और जीने की लालसा बढ़ जाएगी। ढेर सारी अपेक्षाओं के साथ- आपका........................

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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कुत्तों जैसा नाश्ता/भोजन मैं नहीं करता

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ जानते हैं- यदि नहीं तो आप जरूर जानें मेरी दिनचर्या और खाने-पीने का मेनू। सुबह- सभी कामकाजी सदस्यों और बच्चों के स्कूल जाने के उपरान्त बिस्तर छोड़ता हूँ। 9 बजे के बाद चाय, बिस्कुट, नमकीन और स्लाइस मिलती है। चाय बगैर चीनी, बिस्कुट शुगर फ्री, नमकीन सोनू किराना वाले के यहाँ से खरीदा गया जिसे मुँह में डालते ही चीनी/गुड़ के शीरे/चासनी की आवश्यकता पड़ती है। इतना कड़ुवा/तीखा जिसे मैं नहीं झेल पाता हूँ।
पहले चाय, बिस्कुट, नमकीन और पानी का गिलास फिर काफी देर उपरान्त सूखे गर्म की गई ‘स्लाइस’। जनाब- यदि इन सबको किसी व्यक्ति को मुफ्त में खिलाना चाहूँ तो वह देखते ही मुँह बिचकाकर मुझसे कन्नी काट जाएगा। 11 बजे के उपरान्त लौकी, कद्दू, नेनुआ की सब्जी 4-6 फुल्कियाँ (चपाती) खाना है तो खाओ नहीं तो पेट पर हाथ रखकर तखत पर लेट जावो।
2 बजे के बाद काफी इन्तजार पश्चात एक कप चाय (वह भी बिना चीनी की) सादा पानी पीकर प्रतीक्षा करना आदत बन गई है। 4-5 बजे के बीच 2 चपाती दाल और सब्जी। फ्रिज में रखे-रखे सड़ रही धनिया-टमाटर पर ध्यान क्यों दिया जाए। शाम को कभी-कभार एक कप चाय। 9 बजे के आस-पास 2 चपाती और कुछ भी बना हो अल्प मात्रा में। खावो, पानी पिवो और तकदीर व अपने कर्मों के बारे में सोचते-सोचते सो जावो।
यहाँ बताना जरूरी है कि मुझे मिलने वाले नाश्ते/भोजन को भूखे कुत्ते के सामने यदि रख दिया जाए तो वह भी उधर से मुँह फेर कर चला जाएगा। तात्पर्य यह कि जो मैं खाता हूँ उसे कुत्ता नहीं खा सकता या फिर कुत्तों जैसा नाश्ता/भोजन मैं नहीं करता। मैं कुछ नहीं करता- यदि नवजवान होता तो शायद सभी निकम्मा कहते लेकिन ऊपर वाले ने 65 बसन्त दिखा दिया है तब मुझे जवान भी नहीं कहा जा सकता।
गैस, कब्ज, एसिडिटी, दृष्टिदोष, शुगर (मधुमेह) आदि से पीड़ित। मेडिकल जाँच नहीं कराया है। कारण- बीमारी से नहीं जाँच खर्चे से मर जाता। बहरहाल अभी तक मैं जिन्दा हूँ। कमाने वाले सदस्यों ने अभी तक घर से बाहर निकलने को नहीं कहा है। जिस दिन ऐसी नौबत आ गई, घर छोड़कर कहा जाऊँगा यही सब सोच रहा हूँ। यदि आप कोई स्थान बता देंगे तो मेहरबानी होगी। मुझे आप मित्रों द्वारा सुझाए गए मार्ग का बेसब्री से इन्तजार है। कृपया इसे अन्यथा न लेकर सर्वथा गलत न मानें यह सच है कि मेरा नाश्ता/भोजन कुत्ता नहीं खा सकता।

 -भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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काश! मैं भी तुम्हारी पत्रकारिता/लेखन पाठशाला का छात्र होता

आज कल हमारे यहाँ के कई पत्रकार अपने लेखन और कार्यशैली से ‘सुर्खियों’ में हैं। सुना है कि कुछेक ने फेसबुक एकाउण्ट में अपनी प्रोफाइल फोटो परिवर्तित करके अपलोड किया है। ऐसा करने पर उन्हें अनेकों कमेण्ट्स और पसन्द मिली है। एक तरह से वह सुर्खियों में हैं, ये पत्रकार उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं जाहिर सी बात है कि वे प्रदेश की राजनीति पर अपनी स्टाइल में कुछ न कुछ लिखकर पोस्ट करते रहते हैं।
कभी सी.एम. योगी का प्रबल विरोध तो कभी कथितरूप से प्रशंसा करना इस समय उनका बन गया है। अभी योगी की सरकार गठन को एक माह भी नहीं हुआ है फिर भी उन्होंने (पत्रकार/लेखक बन्धु) काफी कुछ लिखकर सोशल मीडिया में पोस्ट कर वाइरल किया है। इस समय वह पहले से कुछ ज्यादा ही चर्चित हो गए हैं।
इसी बीच कई लेख पढ़ने को मिले वह किसी अति सुलझे और ज्ञानी लेखक द्वारा लिखा गया है। उन लेख के शीर्षक, प्रस्तावना और उपसंहार तक को पढ़ने से तबीयत खुश हो गई। यहाँ बता दें कि इन लेखों को लिखने वाले लेखक/पत्रकार ने उत्तर प्रदेश सरकार (वही सी.एम. योगी वाली नवगठित) और जन आकाँक्षाओं का जो विश्लेषण किया है वह काबिले तारीफ है। कई पोर्टलों/प्रिण्ट मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित इन लेखों/सम सामयिकी की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने वालों की तादात काफी है।
मैं यहाँ तटस्थ भाव से उन दोनों पत्रकारों के बारे में कहूँ तो एक डरपोक और दूसरा निर्भीक/बेबाक है। पहला डरपोक इसलिए कि उसे शायद खुद पर एकीन नहीं कि वह पत्रकार की श्रेणी में आता भी है या नहीं। यदि वह पत्रकार (असल मायने में) होता तो अवश्य ही ऊल-जुलूल पोस्टिंग और स्वयं की परसैनिलिटी का स्वरूप भौड़ा न करता। चिन्तक, विचारक बनने की प्रैक्टिस नहीं करनी पड़ती है यह नैसर्गिक होता है।
दूसरे को निर्भीक/बेबाक चिन्तक/विचार और टिप्पणीकार मैं ही नहीं कहता बल्कि उसके लेखों को पढ़ कर हर किसी के मुँह से स्वयं ही ऐसा निकलता है। जहाँ तक मुझे मालूम है ऐसे लेखक अपने यहाँ कम ही हैं। पहले वाले पत्रकार के बारे में लोगों का कहना है कि वह पूर्वाग्रही हैं, लेकिन वहीं दूसरे को लोग ऐसा तो कत्तई नहीं कहते हैं। दोनों पत्रकारों की उम्र में ज्यादा अन्तर नहीं है परन्तु लेख-टिप्पणियाँ पढ़कर यह अवश्य ही प्रतीत होता है कि इन दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर है।
पहलाा पत्रकार मात्र फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया में अपनी टिप्पणियों की वजह से कुछेक खास मित्रों द्वारा प्रशंसा पाता है वही दूसरा प्रबुद्ध वर्गीय लोगों की पसन्द बना हुआ है। दोनों फेसबुक पर दिखाई पड़ते हैं परन्तु एक गम्भीर तो दूसरे के पोस्ट्स को सतही कहा जाता है। पहला चेला तो दूसरे को प्रबुद्धवर्गीय लोगों के लिए पाठशाला कहा जा सकता है। मित्रों लिखता तो मैं भी हूँ और लेखन से इस कदर जुड़ा रहा जैसा कि होना चाहिए। उम्र भी काफी हो चली है।
यदि यह कहूँ कि जब इन पत्रकारों का शैशवाकाल (पत्रकारिता में) था- तब मैं प्रौढ़ हो चुका था। एक बात तो अवश्य कहूँगा कि दूसरे वाले लेखक/पत्रकार/समीक्षक/टिप्पणीकार से उम्र में मैं भले ही वरिष्ठ हूँ लेकिन लेखन श्रेष्ठता में वह मुझसे कई गुना सीनियर है। उसके बारे में जहाँ तक मुझे मालूम है- यदि पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति का बोझ न होता तो वह समाज को अपनी लेखनी के माध्यम से बहुत कुछ देता। सामाजिका सरोकारों, पारिवारिक दायित्वों का जिस ढंग से वह निवर्हन कर रहा है, पत्रकारिता से सम्बद्ध लोग नहीं कर सकते। स्पष्ट कर दूँ कि यदि इन सब जिम्मेदारियों का बोझ हल्का करने वाला कोई सहयोगी मिल जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि वह तनावमुक्त होकर अपनी लेखनी चलाकर ऐसे-ऐसे विचार दे जिसे पढ़कर समाज का हर तबका अवश्य ही ‘‘सीख’’ ले।
डॉ. अम्बेडकर, डॉ. लोहिया के बारे में और सी.एम. योगी, पी.एम. मोदी इसके पूर्व अखिलेश, मायावती सरकारों में उसने गजब की लेखनी चलाकर ख्याति अर्जित किया जिसे वे लोग (पाठक) नहीं भूल सकते हैं जिन्होंने उसे ‘राइट-अप’ को पढ़ा है और मुक्त कंठ से प्रशंसा किया है। असल मायने में वह बुद्धिजीवी- मसिजीवी है। यदि यह नेसर्गिक गुण उसमें न होता तो आज हम एक अच्छे लेखक के लेखों/संदेशों को पढ़ने से वंचित रहते। 
बहरहाल! अब ज्यादा कुछ नहीं- उसके लेखन के बारे में मुझ जैसे लोग एक नहीं अनेकों ग्रन्थ लिख सकते हैं। अन्त में हे प्रियवर उत्कृष्ट लेखन के लिए साधुवाद स्वीकार करो। अरे घनश्याम मैं तुम्हीं से मुखातिब हूँ। जी हाँ यह जो कुछ लिखा है वह घनश्याम भारतीय का लेख पढ़कर....। अभी बहुत कुछ अगले दिनों में............। काश मैं भी घनश्याम भारतीय की पत्रकारिता/लेखन पाठशाला का छात्र होता। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
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