पहले बुजुर्गों के मुँह से सुना करता था कि परिजन यानि पारिवारिक सदस्य ही धन हैं। जिनका कुनबा बड़ा होता है वे ही हर तरह से सम्पन्न होते हैं। मैं इसका पूर्णतया खण्डन तो नहीं करता परन्तु जब अपने परिवार पर दृष्टिपात करता हूँ तब महसूस करता हूँ कि परिवारीजनों की अधिक संख्या दरिद्रता के अलावा और कुछ नहीं देती है।
लोग धन इसलिए कमाते हैं ताकि वे समाज में प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ सुख-सुविधा सम्पन्न हों। हमारे अपने परिजन धन तो जरूर कमा रहे हैं परन्तु सुख-सुविधा विहीन जिन्दगी जी रहे हैं। मसलन प्रचण्ड गर्मी में बिल-बिलाना, ठण्डक में कांपना और बरसात में भीगना इनके क्रिया-कलापों से इनकी नियति बन गई है। हमने ऐसों को भी देखा है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने भी भौतिक सुख-सुविधाएँ एकत्र कर रखा है।
कहते हैं ‘‘ज्यादा जोगी मट्ठ उजाड़’’ ठीक उसी तरह हमारे परिवार की दशा है। सभी अपने-अपने फन में माहिर हैं- परन्तु खा-पीकर मल त्यागने तक सीमित है उनका जीवन। कम से कम सुख-सुविधा एकत्र कर अपना और अपने आश्रितों का तो खयाल रखते। ये लोग ऐसा करेंगे हमें तो एक प्रतिशत भी उम्मीद नहीं है।
लोग धन इसलिए कमाते हैं ताकि वे समाज में प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ सुख-सुविधा सम्पन्न हों। हमारे अपने परिजन धन तो जरूर कमा रहे हैं परन्तु सुख-सुविधा विहीन जिन्दगी जी रहे हैं। मसलन प्रचण्ड गर्मी में बिल-बिलाना, ठण्डक में कांपना और बरसात में भीगना इनके क्रिया-कलापों से इनकी नियति बन गई है। हमने ऐसों को भी देखा है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं लेकिन उन्होंने भी भौतिक सुख-सुविधाएँ एकत्र कर रखा है।
कहते हैं ‘‘ज्यादा जोगी मट्ठ उजाड़’’ ठीक उसी तरह हमारे परिवार की दशा है। सभी अपने-अपने फन में माहिर हैं- परन्तु खा-पीकर मल त्यागने तक सीमित है उनका जीवन। कम से कम सुख-सुविधा एकत्र कर अपना और अपने आश्रितों का तो खयाल रखते। ये लोग ऐसा करेंगे हमें तो एक प्रतिशत भी उम्मीद नहीं है।







0 Komentar