मजबूरी का नया नाम पी.एम. मोदी

500/1000 के नोट बन्द होने से किसी को भले ही परेशानी न हो रही हो, लेकिन हमारे सामने दिक्कतों का पहाड़ टूट पड़ा है। कहीं पी.एम. मोदी की जयकार हो रही है तो कहीं राजनीतिक दलों की रैलियाँ निकल रही हैं, परन्तु हमें चाय पीने की मोहताजी का सामना करना पड़ रहा है।
चन्द पैसे रहे भी हैं तो वह बैंकों में जमा हैं। बैंकों में नई नोट को कौन कहे पुराने नोट का भी अकाल पड़ गया है। शादी-ब्याह का मौसम हो या फिर आम दिन की खरीददारी बगैर पैसों के मुश्किल है।
कालाधन क्या होता है यह तो हमें नही मालूम लेकिन इतना तो जरूर ही समझ में आ रहा है कि अपना सफेद धन पाना ही मुश्किल हो गया है।
उधर पी.एम. मोदी स्थिति सामान्य करने के लिए देश की जनता से 50 दिन की मोहलत माँग रहे हैं, इधर हम हैं कि एक कप चाय पीने को मोहताज हैं।
इण्डिया में रहना है तो मोदी-मोदी कहना है। बीते 9 नवम्बर 2016 से वही कह रहा हूँ। पुराने नोटों की बन्दी बैंकों में पैसों का अकाल, नोट उगलने वाली ए.टी.एम. मशीनों पर लगी लम्बी लाइनें- ऐसे में बस इतना ही हम जैसे कह रहे हैं कि इण्डिया जो भारत है इसी हिन्दुस्तान में रहने वालों के लिए मोदी सबसे बड़ी मजबूरी बनकर रह गए हैं।
अब वह लोग जो कभी कहा करते थे कि मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी है उनके मुँह से यही निकल रहा है कि उनकी मजबूरी का नाम पी.एम. मोदी हो गया है। तात्पर्य यह कि हम जैसों की मजबूरी की परिभाषा अब बदल गई है।

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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