........चारो धाम घरवाली है

ससुराल यानि ससुर (श्वसुर) का आलय। यह स्थान वाकई बेहद अच्छा कहा जा सकता है। पुरूष के लिए ससुराल में ससुर, सास, सरहज, साले और सालियाँ जबकि स्त्री के लिए सास-ससुर, पति, देवर, ननद बड़ा आनन्ददायी स्थान होता हे ‘ससुराल’। सा-ससुर-साला-साली का जिक्र आए तो यह फिल्मी गीत स्वयमेव जेहन में आ जाता है और गुनगुनाने का जी चाहता है। 
‘‘सासू तीरथ, ससुरा तीरथ, तीरथ साला, साली है।
दुनिया के सब तीरथ झूठे, चारो धाम घरवाली है।।’’ 
‘‘हो कभी खोले न तिजोरी का ताला
हाँ मेरा ससुरा बड़ा पैसे वाला।।’’
यह तो रही पुरूष की सोच जो अपनी ससुराल को टकसाल समझता है और उस टकसाल का मालिक ससुर को मानता है। अब आइए स्त्री के बारे में कुछ कहा जाए कि वह क्या सोचती है। जब स्त्री यानि नवब्याहता लड़की अपने मायके से ससुराल के लिए प्रस्थान करती है तब यह गीत खूब गाया जाता है। 
‘‘डोली चढ़के दुल्हन ससुराल चली...................’’
और ससुराल पहुँचकर उसे जो अनुभूति होती है तो वह अपनी पीड़ा बालेश्वर जी के इस गीत से कहती है-  
सास मोरी चोन्हरी, ससुर चकचोन्हरा..........
और अन्त में वह सब कुछ बिसार कर अपने पति को ही सब कुछ मान बैठती है और कहती है- 
मेरा पति मेरा देवता है
यह तो कुछ झलकियाँ है ससुराल और वर-कन्या की सोच का। कालान्तर में यदि दुर्भाग्य से ऐसा हुआ तब जब लड़कियाँ दहेज को लेकर प्रताड़ित की जाने लगती हैं- तब आई.पी.सी. की धारा 498ए में पति, सास, ससुर, देवर और अनब्याहता ननदें मुल्जिम बनाए जाते हैं। क्या समझे- समझदारों के लिए इशारा ही काफी है।
यानि- अब न तो कोई ससुर दामाद के लिए अपनी तिजोरी खोलेगा और न ही कोई वधू प्रताड़ना सहेगी। नवब्याहताएँ सीधा महिला हेल्प लाइन से सम्पर्क कर 5 लोगों को हवालात कराने में लगभग सक्षम हो गई हैं। दूल्हे और उसके माँ-बाप को ध्यान देना होगा उन्हें लोभ त्यागकर स्वयं की कमाई से प्राप्त धन का उपयोग करना पड़ेगा। मतलब सीधा है- गेंद दूल्हे के ससुरालीजनों और उसकी ब्याहता के पाले में हैं। तो सावधान रहे मेरी तो यही राय है- वह भी मुफ्त की। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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