मैं नालायक हूँ

कलयुग है-
इस युग में रिश्ते मायने
नहीं रखते वे सभी-
अपना हित साधते हैं।
उनके लिए
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा नहिं सम अधमाई।।
कोई मायने नहीं रखता।
रिश्ते अजीब सा घाव देने
लगे हैं- इनके द्वारा दिए गए
रिसते घावों की पीड़ा
असह्य होती है
झूठ, फरेब, मक्कारी से भरे
ऐसे रिश्तों से प्रायः
दो-चार होना पड़ता है।
वे भाग्यशाली हैं
जिनका ऐसे रिश्तों से पाला
नहीं पड़ता-
मैं अभागा हूँ- मेरे सभी
‘रिश्ते’ असहय पीड़ा दायक हैं।
उनकी सोंच अनुसार
वे लायक हैं और उनके
बारे में ऐसा सोचने वाला
मैं नालायक हूँ।।

 -भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

Previous
Next Post »
0 Komentar