गिफ्ट- इस फिरंगी भाषा वाले शब्द को बोलचाल में तोहफा कहते हैं। तोहफा उर्दू शब्द है हम हिन्दुस्तानी हैं यहाँ लोक भाषाओं को छोड़कर लगभग 22 भाषाएँ बोली जाती हैं। हमारी पैदाइश विशुद्ध यानि खांटी देहाती माहौल में हुई उसी का परिणाम है कि हमारे जेहन में पूर्वजों/अग्रजों द्वारा कही गई लोकोक्तियाँ, मुहावरे, कहावतें आज भी विद्यमान हैं। जब भी हम लिखने का मूड बनाते हैं तब शब्द-संकलन, शब्द-संयोजन में उनसे काफी हेल्प मिलती है। भाषाएँ भले ही आधिकारिक रूप से 22 बोली जाती हों फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी की तर्ज पर हम हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं। राष्ट्रीय झण्डा-तिरंगा और हमारी अपनी भाषा में उक्त तीनों भाषाओं का ऐसा संगम देखने को मिलता है जैसा कि गंगा-जमुना और सरस्वती का प्रयागराज में। वही प्रयागराज जो पहले इलाहाबाद हुआ करता था........खैर! छोड़िए शहरों के नाम परिवर्तन की बातें बाद में..........। इस समय मुझे लाला, दादा जैसे शब्द मिले हैं जिन पर कुछ लिखने का मन हो आया है। लाला..........यानि लाओ........दादा यानि दो..........।
गिफ्ट- त्योहार के अवसर पर मांग कर कुछ पाना भी तोहफा कहा जाने लगा है। हमने भी चार महीने लगातार प्रयास किया था परिणाम यह हुआ कि अगस्त के शुरूआती दौर से लगातार मिन्नतें करने के पश्चात आखिर वह दिन आ गया जब मुझे फोन करके कहा गया कि आओ अपना गिफ्ट ले लो। हमारा सीना 56 का हो गया। प्रतीत हुआ कि हमारे गाँव से लेकर देश की राजधानी दिल्ली में विकास का सूरज अपने चरम पर है। नोटबन्दी का कोई असर नहीं, जी.एस.टी. की कोई प्रॉब्लम नहीं। भ्रष्टाचार का नामो-निशान नहीं.....महंगाई का अता-पता नहीं। बाखुदा मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ अपने पूरे होश-ओ-हवास में कह रहा हूँ। यह आप पर डिपेंड करता है कि मुझे अपसेट माइन्डेड मान लें। छोड़िए.....आइए बताएँ हम पर क्या बीती और हम दिवाली का गिफ्ट पाने में कैसे सफल रहे.............।
हमारे गाँव में बहुत पहले एक कहावत कही जाती थी कि एक बिरादरी होती है जो सिर्फ लेना ही जानती है देना उसके ब्लड में नहीं। उस जाति को तत्समय लाला कहा जाता था। चूँकि अब 21वीं सदी चल रही है और सभी कुछ हाईटेक हो गया है। इस तरह की परिस्थिति में यदि हमारे देहात में कहे जाने वाले लाला लोग अब कोई दूसरा उपनाम रखते हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। उपनाम को लेकर काफी भ्रान्तियाँ हैं उस पर ज्यादा कुछ नहीं कहना है।
हाँ तो लाला जी हमारे यहाँ एक महकमे में ऊँचे ओहदे पर पोस्टेड हैं। उनका डिपार्टमेन्ट फूड सेफ्टी और ह्यूमन हेल्थ से ताल्लुक रखता है। हमने कुछ गलतियाँ कर दी थीं उन्हीं का खामियाजा भुगत रहा हूँ। लाला दिल के इतने दलिद्र होंगे यह नहीं मालूम था। हमने लगभग 7 हजार रूपए खर्च करके एक ऐड डिस्प्ले किया था जिसका भुगतान तो नहीं मिला परन्तु दिवाली के अवसर पर बनारसी लाला ने फोन कर हमें बुलाया और कहा कि आओ अपना गिफ्ट ले जाओ। इतना सुनना था कि हमारी बांछे खिल गईं और फाग व वाइल्ड स्टोन आदि को जल्दी-जल्दी अपने बॉडी पर झोंक मारा पैन्ट की जिप हड़बड़ाहट में बगैर बन्द किए ही गिफ्ट लेने निकल पड़ा। तीन किलोमीटर की दूरी गिफ्ट पाने की लालसा में कब पूरी हो गई पता ही नहीं चला।
लाला के कार्यालय जब पहुँचा तो देखा कि वह वहाँ नहीं थे। फोन कर पूछा कि आप कहाँ मिलेंगे मैं आपकी ऑफिस के मुख्य द्वार पर हूँ तो उन्होंने कहा कि अन्दर जाओ वहाँ राजकुमार साहब बैठे हैं अपना नाम बताओ, परिचय दो, गिफ्ट लो और मुझसे बात कराओ.........समझ गए ना........हाँ साहब.....। अन्दर प्रवेश किया, वहाँ ठीक उसी तरह करके एक गिफ्ट पैक झोले में रखा और मायूस सा होकर वापस हो लिया। इसी दौरान पैन्ट की जिप बन्द किया और सोचने लगा कि लाला साहब ने हमारे साथ 7 हजार की जगह यह क्या पकड़ा दिया। रहा नहीं गया.......गिफ्ट पैक का डिब्बा खोल डाला देखा तो विशुद्ध हमारे गाँव के चौराहे पर पकौड़ी साव के यहाँ बनने वाली बर्फी की तरह ही मिठाई थी, जिसे एक बगैर नाम वाले डिब्बे में रखकर पकड़ा दी गई थी। वजन आधा से एक किलो के बीच रहा होगा। हम गुणा-गणित करने लगे तो पता लगा कि बमुश्किल उसकी कीमत 100-150 रूपए रही होगी। ऐसा तब होता जब मैं खुद उसे एक लेमैन की तरह ग्राहक बनकर हलवाई से खरीदता। यह तो फूड साहब का गिफ्ट था जिसे किसी बेचारे हलवाई ने ही मुफ्त में दिया रहा होगा। जाने भी दीजिए.....साहब तो साहब हैं........कहना बस इतना है कि हे लाला.........तुम्हारी अकल को क्यों काठ मार गया है.........? अगर तोहफा ही देना था तो भिजवा भी सकते थे एक-दो हर्फ यह भी लिख देते कि- हैप्पी दिवाली या दिवाली की मुबारकबाद, दिवाली की शुभकामनाएँ...............।
कहते हैं कि दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया........गलत........अब तो कहना पड़ेगा कि दाता एक आप और भिखारी मैं और हमारी बिरादरी..........। कम से कम इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि कौन सीनियर भिखारी है और कौन जूनियर.......। माना कि मैं तुम्हारी नजर में ब्राण्डेड बिरादरी का भिखारी नहीं परन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि मैं मेरी बिरादरी का सबसे सीनियर मोस्ट मेम्बर अभी भी लाला और दादा आदि जैसों का तियाँ-पाँचा करने के लिए जीवित हूँ। आहत हूँ परन्तु आश्चर्यचकित नहीं। आहत इसलिए कि तुमसे यह उम्मीद नहीं थी और आश्चर्यचकित इसलिए नहीं कि वर्षों पूर्व गाँव वाले बड़के भइया कहा करते थे कि मन्नू (मेरा बचपन का नाम) नेकी कर दरिया में डाल, लाला कौम से बचके रह....यह कौम आपन भला, भला जगमाहीं दूसरे कै भला होय चाहे ठेंगे से नाहीं को अपना मूल मंत्र मानती है, और इसी लिए सबसे लेने की बात करती है देने की नहीं। आज आपका गिफ्ट पाकर मुझे हमारे बड़े भइया याद आ रहे हैं। उनका इंतेकाल हुए 30 साल से अधिक का समय हो गया है। वह हिन्दी में स्वर्गीय, उर्दू में मरहूम और अंग्रेजी में लेट हो चुके हैं।
दिवाली आई, मन मयूर नाचने लगा। तुम्हारी फोन कॉल आई मैं मिथुन चक्रवर्ती बन गया गिफ्ट पाया तो निहाल होने की जगह बेहाल हो गया। एक बात तो है ही तुम्हारा गिफ्ट देने का अन्दाज किसी भी राजा-महाराजा से कम नहीं। तुम लाला होते हुए भी सम्राटों, नवाबों, राजा-महाराजाओं से कम नहीं......। तुम महीन हो, लाला हो........हम भी कुछ कम नहीं......तेरा पीछा न छोड़ेंगे सोणिये, भेज दे चाहे जेल में.........। क्या समझे.........? कृपा कर तुम मेरे 7 हजार अदा करने की व्यवस्था करो............यह मत कहना कि.........विभागीय लोग तुम्हें कॉआपरेट नहीं करते। मैं सीख नहीं दूँगा कि भला मानुष बनो.......लाला हो तुम तो खुद समझदार हो, अक्लमन्द हो, बुद्धिमान हो......। तीन-चार महीनों से तुम्हारे टरकाऊ रवैय्ये से मुझे काफी कष्ट हो रहा है साथ ही आश्चर्य भी....।
इस एपिसोड में फिलहाल इतना ही शेष आने वाले दिनों में............। मैं इतना संगदिल नहीं जो यह न कहूँ कि हैप्पी दिवाली.........। मैं पकौड़ी साव की दुकान पर बनाई जाने वाली मिठाई की तरह वह तुम्हारा गिफ्ट पैक खोलकर बर्फी खा रहा हूँ.......अच्छा लग रहा है, और इस मौके पर तुम ही याद आ रहे हो........। भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, वरिष्ठ नागरिक/पत्रकार, 9454908400








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