काश! मैं भी तुम्हारी पत्रकारिता/लेखन पाठशाला का छात्र होता

आज कल हमारे यहाँ के कई पत्रकार अपने लेखन और कार्यशैली से ‘सुर्खियों’ में हैं। सुना है कि कुछेक ने फेसबुक एकाउण्ट में अपनी प्रोफाइल फोटो परिवर्तित करके अपलोड किया है। ऐसा करने पर उन्हें अनेकों कमेण्ट्स और पसन्द मिली है। एक तरह से वह सुर्खियों में हैं, ये पत्रकार उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं जाहिर सी बात है कि वे प्रदेश की राजनीति पर अपनी स्टाइल में कुछ न कुछ लिखकर पोस्ट करते रहते हैं।
कभी सी.एम. योगी का प्रबल विरोध तो कभी कथितरूप से प्रशंसा करना इस समय उनका बन गया है। अभी योगी की सरकार गठन को एक माह भी नहीं हुआ है फिर भी उन्होंने (पत्रकार/लेखक बन्धु) काफी कुछ लिखकर सोशल मीडिया में पोस्ट कर वाइरल किया है। इस समय वह पहले से कुछ ज्यादा ही चर्चित हो गए हैं।
इसी बीच कई लेख पढ़ने को मिले वह किसी अति सुलझे और ज्ञानी लेखक द्वारा लिखा गया है। उन लेख के शीर्षक, प्रस्तावना और उपसंहार तक को पढ़ने से तबीयत खुश हो गई। यहाँ बता दें कि इन लेखों को लिखने वाले लेखक/पत्रकार ने उत्तर प्रदेश सरकार (वही सी.एम. योगी वाली नवगठित) और जन आकाँक्षाओं का जो विश्लेषण किया है वह काबिले तारीफ है। कई पोर्टलों/प्रिण्ट मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित इन लेखों/सम सामयिकी की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने वालों की तादात काफी है।
मैं यहाँ तटस्थ भाव से उन दोनों पत्रकारों के बारे में कहूँ तो एक डरपोक और दूसरा निर्भीक/बेबाक है। पहला डरपोक इसलिए कि उसे शायद खुद पर एकीन नहीं कि वह पत्रकार की श्रेणी में आता भी है या नहीं। यदि वह पत्रकार (असल मायने में) होता तो अवश्य ही ऊल-जुलूल पोस्टिंग और स्वयं की परसैनिलिटी का स्वरूप भौड़ा न करता। चिन्तक, विचारक बनने की प्रैक्टिस नहीं करनी पड़ती है यह नैसर्गिक होता है।
दूसरे को निर्भीक/बेबाक चिन्तक/विचार और टिप्पणीकार मैं ही नहीं कहता बल्कि उसके लेखों को पढ़ कर हर किसी के मुँह से स्वयं ही ऐसा निकलता है। जहाँ तक मुझे मालूम है ऐसे लेखक अपने यहाँ कम ही हैं। पहले वाले पत्रकार के बारे में लोगों का कहना है कि वह पूर्वाग्रही हैं, लेकिन वहीं दूसरे को लोग ऐसा तो कत्तई नहीं कहते हैं। दोनों पत्रकारों की उम्र में ज्यादा अन्तर नहीं है परन्तु लेख-टिप्पणियाँ पढ़कर यह अवश्य ही प्रतीत होता है कि इन दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर है।
पहलाा पत्रकार मात्र फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया में अपनी टिप्पणियों की वजह से कुछेक खास मित्रों द्वारा प्रशंसा पाता है वही दूसरा प्रबुद्ध वर्गीय लोगों की पसन्द बना हुआ है। दोनों फेसबुक पर दिखाई पड़ते हैं परन्तु एक गम्भीर तो दूसरे के पोस्ट्स को सतही कहा जाता है। पहला चेला तो दूसरे को प्रबुद्धवर्गीय लोगों के लिए पाठशाला कहा जा सकता है। मित्रों लिखता तो मैं भी हूँ और लेखन से इस कदर जुड़ा रहा जैसा कि होना चाहिए। उम्र भी काफी हो चली है।
यदि यह कहूँ कि जब इन पत्रकारों का शैशवाकाल (पत्रकारिता में) था- तब मैं प्रौढ़ हो चुका था। एक बात तो अवश्य कहूँगा कि दूसरे वाले लेखक/पत्रकार/समीक्षक/टिप्पणीकार से उम्र में मैं भले ही वरिष्ठ हूँ लेकिन लेखन श्रेष्ठता में वह मुझसे कई गुना सीनियर है। उसके बारे में जहाँ तक मुझे मालूम है- यदि पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति का बोझ न होता तो वह समाज को अपनी लेखनी के माध्यम से बहुत कुछ देता। सामाजिका सरोकारों, पारिवारिक दायित्वों का जिस ढंग से वह निवर्हन कर रहा है, पत्रकारिता से सम्बद्ध लोग नहीं कर सकते। स्पष्ट कर दूँ कि यदि इन सब जिम्मेदारियों का बोझ हल्का करने वाला कोई सहयोगी मिल जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि वह तनावमुक्त होकर अपनी लेखनी चलाकर ऐसे-ऐसे विचार दे जिसे पढ़कर समाज का हर तबका अवश्य ही ‘‘सीख’’ ले।
डॉ. अम्बेडकर, डॉ. लोहिया के बारे में और सी.एम. योगी, पी.एम. मोदी इसके पूर्व अखिलेश, मायावती सरकारों में उसने गजब की लेखनी चलाकर ख्याति अर्जित किया जिसे वे लोग (पाठक) नहीं भूल सकते हैं जिन्होंने उसे ‘राइट-अप’ को पढ़ा है और मुक्त कंठ से प्रशंसा किया है। असल मायने में वह बुद्धिजीवी- मसिजीवी है। यदि यह नेसर्गिक गुण उसमें न होता तो आज हम एक अच्छे लेखक के लेखों/संदेशों को पढ़ने से वंचित रहते। 
बहरहाल! अब ज्यादा कुछ नहीं- उसके लेखन के बारे में मुझ जैसे लोग एक नहीं अनेकों ग्रन्थ लिख सकते हैं। अन्त में हे प्रियवर उत्कृष्ट लेखन के लिए साधुवाद स्वीकार करो। अरे घनश्याम मैं तुम्हीं से मुखातिब हूँ। जी हाँ यह जो कुछ लिखा है वह घनश्याम भारतीय का लेख पढ़कर....। अभी बहुत कुछ अगले दिनों में............। काश मैं भी घनश्याम भारतीय की पत्रकारिता/लेखन पाठशाला का छात्र होता। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400

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