मेरे अपनों को काठमारी बुद्धि से कब मिलेगी निजात, बनेंगे सरोकारी...?

गर्मी की तपिश से परेशान परिवार का 8 वर्षीय शक्ति मेरे पास आया और बोला पापा जब आप के कमरे में कूलर चलता था तब खूब ठण्डी हवा मिलती थी, अब जब वह नहीं चल रहा है तब गर्मी से परेशान होना पड़ता है। उस बालक की बातें सुनकर कलेजा मुँह को आ गया। मैं अन्दर ही अन्दर रोने लगा था फिर अपने परिवार और पारिवारिक सदस्यों के बारे में सोचने लगा। शक्ति मेरे अनुज का छोटा पुत्र है। नटखट है फिर भी तेज दिमाग रखता है। मैंने उसे पुचकार कर कहा बेटा जावो फुल सर्ट पहन लो वर्ना ‘लू’ लग जाएगी, साथ ही उसे समझाया कि ठण्डक, गर्मी, बरसात के मौसम को झेलने की आदत डालो। वह मेरे लेखन कक्ष से अन्दर घर के भीतर चला गया था।
बिजली का बिल भी आता है- यह किसी को नहीं मालूम। काम काजी लोगों से कैसे कहूँ कि समय पर बिजली के बिल का भुगतान कर दें। पुरूष सदस्य पैसा कमाते हैं और सुख-सुविधा के साधनों का उपयोग/प्रयोग नहीं करते। 65 वर्षीय जीवन में मैंने इतना धन नहीं कमाया तब संचय कैसे करता। अनुज 48 वर्ष के जीवन में क्या कर रहे हैं, यह शायद उन्हें ही नहीं मालूम तब किसी दूसरे को कैसे पता चलेगा? पोतियों के पिता श्री कमाते हैं- घर का संचालन करते हैं उनके ऊपर कितना ‘भार’ है इसे सोचकर मैं चुप्पी मारे हुए हूँ। उनसे कैसे कहूँ कि पैसे का उपयोग सुख-सुविधा के लिए भी किया करो।
सभी ठकुरसुहाती पसन्द है। वाहवाही लूटने के लिए अपने घर-परिवार की चिन्ता छोड़कर औकात से अधिक धन का अपव्यय करते हैं, परन्तु कभी यह नहीं सोचते कि घर-परिवार का सुचारू संचालन कैसे हो। भतीजे के पापा, पोतियों के पिताश्री और उनकी दादी कमाऊ कहलाते हैं। गृहणियाँ उन्हीं द्वारा दिए गए आदेश निर्देशों का पालन करती हैं। बच्चे उनकी कमाई पर पढ़-लिख रहे हैं। मैं भी एक तरह से आश्रित बना घर की रखवाली कर रहा हूँ। इन कमाऊ परिवारी सदस्यों के बारे में ज्यादा क्या कहूँ- बस यह समझिए कि ये लोग यह विस्मृत कर चुके हैं कि जिस समाज में वह लोग अपनी वाली कर रहे हैं उसका आधार मैंने बनाया है।
अनुज और उनकी धर्मपत्नी की अलग खिचड़ी पकती है। वे अपने मुताबिक ऐसे कार्य करते हैं जिसे कम से कम ज्ञानी लोग तो नहीं कर सकते हैं। दिखावा पसन्द हैं ये दोनों। बच्चे अबोध हैं ऊपर वाला न करे कि उनमें भी अपने मातृ-पितृ के गुण आ जाएँ, यदि कहीं ऐसा हो गया तो वह लोग भी मेरे अनुज की तरह ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ बनकर दूसरों की जी हुजूरी और रिमोट चालित मानव होकर रह जाएँगे। अनुज की खासियत यह है कि- करना कुछ न पड़े और जरूरतें सभी पूरी हुआ करें। बातें लम्बी-चौड़ी, घर-परिवार के प्रति कोई सरोकार ही नहीं।
पोतियों के पिता श्री- जी हाँ- निरंकुश/स्वेच्छाचारी ठकुरसुहाती शस्त्र से घायल। कर्मकाण्डियों के पाखण्ड में पड़कर स्वयं की प्रतिभा का सर्वनाश करने वाले। बैसाखीके सहारे कब तक जिया जाता है, कुछ तो प्रयास करो, आदत डालो, स्वयं चलने का प्रयास करो- सफलता जरूर मिलेगी- लेकिन मैं कौन होता हूँ उन्हें नसीहत देने वाला........? पोतियों की दादी- उम्र 60$ है। इस उम्र में जितना हो पा रहा है उससे अधिक कर रही हैं। दूरगामी परिणाम के बारे में सोच रखें यह उनके वश की बात नहीं। एकलौते पुत्र की माँ होने के कारण पुत्र के कार्यों की सभी जिम्मेदारियाँ भी अपने ऊपर ले रखी है। मुझे देखकर मन ही मन गालियाँ देती होगी- हिन्दू रीति-रिवाज से शादी के बन्धन में बंधी वृद्धावस्था को प्राप्त एक महिला है, वर्ना वह ईश्वर से मन्नत मांग लेती कि मुझे जल्द ही ऊपर उठा ले। खैर-
पैसा यानि धन-दौलत, सभी कमाते हैं और भौतिक सुख-सुविधा का ख्याल रखते हैं। परन्तु मेरे परिवार में मेरी सोच का सब कुछ उल्टा ही हो रहा है। मसलन- गर्मी पड़ रही है भौतिक शरीर को राहत प्रदान करने के लिए कूलर तो लगवा ही सकते हो। जब हीटर, वाशिंग मशीन, मिक्सर ग्राइण्डर, फ्रिज रखे हो तो कम से कम बच्चों के आराम के लिए कूलर, आर.ओ. सिस्टम वाटर प्यूरीफायर, शौचालय तो बनवा ही लो। यही नहीं कम से कम जब सब खर्च तुम्हारे ऊपर है तब राजस्व बिलों को क्यों भूल जाते हो-? उन्हें अदा करके एक शिक्षित नागरिक होने का परिचय तो दो। हाँ-हाँ जानता हूँ कि मिक्सर ग्राइण्डर, वाशिंग मशीन, फ्रिज, टी.वी. तुमने अपने पैसे से नहीं खरीदा है परन्तु उनका इस्तेमाल तो हो रहा है जिसमें बिजली खर्च होती है और हर माह ढाई हजार बिजली का बिल होता है। कौन भुगतान करेगा- इन सबकी भी जानकारी रखा करोगे- आने वाले दिनों में तुम्हारे लिए ही लाभकारी रहेगा।
शक्ति बच्चे की बातें न सुनी होती तो इतना लम्बा चौड़ा आलेख शब्द-प्रहार के रूप में लिखने की क्या आवश्यकता थी-? बहरहाल- हे ‘शब्द-प्रहार’ स्तम्भ को पढ़ने वाले मित्रों (स्त्री/पुरूषों) मैंने जो भी लिखा है क्या वह गलत है अथवा किसी हद तक सही-? आप अपनी बेबाक राय दें। आप से गुजारिश है कि आप ईश्वर से दुआँ करें कि बच्चे शक्ति (8) के पिता-माता और उससे सम्बन्धित अन्य कमाऊ परिजनों को सद्बुद्धि आए और वह लोग कुछ ऐसा करें जिसे करने के बाद लगे कि सचमुच इन लोगों का सरोकार एक संयुक्त परिवार और उसके हर सदस्यों की आवश्यक आवश्यकता से है। इनके सरोकारी बनना/होना स्वयं इनके लिए, परिवार और समाज के लिए आवश्यक है। ऐसा होने से मैं तनाव से मुक्ति पा जाऊँगा और जीने की लालसा बढ़ जाएगी। ढेर सारी अपेक्षाओं के साथ- आपका........................

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

9454908400

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