मैंने माननीय बनने का विचार क्यों छोड़ा, कारण आप भी जानें......

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ मित्रों! मैंने सोचा कि आप सबसे राय ले लूँ, इसलिए यह बात लिखकर आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। फ्रेन्ड्स बात यह है कि अभी लेटे-लेटे मन में विचार आया कि जनप्रतिनिधि बनकर समाजसेवा करूँ......? शायद आप में से अधिकाँश मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते होंगे इसलिए पहले आप अच्छी तरह जान लें कि मैं कौन हूँ।
वर्षों से कलमघिसने का काम कर रहा हूँ स्वयं से लेकर अपनों तक किसी को बख्शा नहीं- बड़ी वाह-वाही लूटा लेकिन अब वाहवाही से काम नहीं चलता दिख रहा है तो सोचा समाज सेवा करके धन कमाऊँ। मुझे मालूम है कि आप लोग मेरी स्पष्टवादिता को नजरन्दाज नहीं करेंगे- करना भी नहीं चाहिए। समाजसेवा ही एक ऐसा माध्यमा है जिसको अपनाने से कंगाली दूर होगी? अभी तक इलेक्शन लड़कर चुनाव में जीत दर्ज कर जनप्रतिनिधि कहलाने का विचार कभी भी नहीं आया था, परन्तु अब यह आने लगा है।
लोगों से सुना है और महसूस भी किया है कि जिसके पास धनबल नही है वह इलेक्शन जीतने को कौन कहे लड़ने का ख्वाब देखना छोड़ दे। मैंने किसी को एक कप चाय तक नहीं पिलाया है तब वोट पाने के लिए वोटर्स को ‘पुलाव’ कहाँ और कैसे लिखा पाऊँगा। यही नहीं एक पत्रकार के रूप में मैंने किसी को नहीं बख्शा है तब कैसे उम्मीद करूँ कि लोग बहैसियत एक वोटर मुझे अपना कीमती वोट देंगे-? इलेक्शन लड़कर चुनाव जीतने का मानक भी मेरे से काफी दूर है। कृष्णा सदन तक की यात्रा नहीं किया है। कलम के बजाए कट्टा तक थामने का साहस नहीं रहा और न कभी पुलिस की गाड़ी में ठूस कर थाना कोतवाली ही ले जाया गया हूँ।
जानकारों के मुँह से सुन चुका हूँ कि जो व्यक्ति इस तरह के मानकों को पूरा नहीं करता है वह जनता द्वारा ‘डिस्कार्ड’ कर दिया जाता है यानि इलेक्शन/चुनाव लड़ने के योग्य ही नहीं है। सुलेमान मिला था- मैंने अपनी जिज्ञासा शेयर किया तो उसने तपाक से कहा मियाँ कलमघसीट तुम सचमुच सठिया गए हो, जब इलेक्शन लड़कर जनप्रतिनिधि बनना था तब कलम क्यों पकड़ी- शुरूआती दौर में रमपुरिया, हाकी डण्डे फिर देशी तमंचा कालान्तर में आधुनिक हथियार रखकर जरायम पेशा अख्तियार कर लिया होता ऐसा करने से तुम्हारे पास वह सब कुछ रहता जो माननीय बनने के लिए आवश्यक होता है। मसलन समाज में दबदबा, धनबल और सत्ता के गलियारों तक अपने कृत्य से तुम्हारी पहुँच रहती।
मैंने सुलेमान से कहा यार मेरे लिए तुम कुर्बानी दो- वह पूँछा कैसी कुर्बानी। कहना पड़ा यार कहीं से ऐसे अस्त्र-शस्त्र मुहैय्या करा दो, जिसके रखने से मुझे पुलिस अन्दर हवालात करके लात-घूंसों, डण्डों से मेरी दैहिक समीक्षा करे और आपराधिक मुकदमा कायम कर नौ लाख की हवेली में जाने का मार्ग प्रशस्त करवा दे। सुलेमान हंसने लगा बोला- वाह मियाँ, क्या गजब की सोचा है ऐसा करके तुमसे पहले मैं चुनाव जीत कर माननीय बनने के लायक बना दिया जाऊँगा।
समझे मियाँ, न समझ पाए हो तो बता दूँ कि अवैध तमंचा एवं प्राणघातक अस्त्र-शस्त्र रखने के अलावा तुम्हें मुहैय्या कराने का मुझे पुलिस क्या ईनाम देगी-? अरे भइया कलमघसीट इस उम्र में जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी। हम दोनों को पहले तो पुलिस घसीटकर हवालात में लात-घूसों और डण्डों से भरहींक दैहिक समीक्षा करेगी तत्पश्चात् कृष्ण जन्मालय यानि जेल भेज देगी। कलमघसीट तुम माननीय बनने का विचार अपनी जेहन से निकाल दो। सुलेमान की बात सुनने के बाद मेरे होश उड़ गए। हलक तर करने के लिए मटके से पानी निकालकर एक ही साँस में पी गया। फिर सोचने लगा-
ठीक ही तो कह रहा है मेरा लंगोटिया यार। अब जब हम लोग 60प्लस और 70 के करीब पहुँच रहे हैं तब मैं तो मरूँगा ही साथ ही मेरा यार भी अपनी बीबी को बेवा बना देगा। यही सब सोच रहा था- तभी सुलेमान ने कहा क्यों माय डियर कलमघसीट मेरी सलाह कैसी लगी.........? कहना पड़ा यार जो कुछ होना था वह हो गया। अब माननीय बनने का विचार त्याग रहा हूँ। अब एक तरह से यह समझूँगा कि धन-बल भले ही न हो कलमबल तो है ही- बची खुची लाइफ में कलम चलाता रहूँगा। मित्रों आप लोगों को अलानाहक मैंने कष्ट दिया, जिसका मुझे बेहद दुःख है। 

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, 9454908400

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